Saturday, June 26, 2021

अमलतास

 बिछ गए पुष्प अमलतास के

राह में कुछ इस तरह 

पाँव के नीचे बसंत छा गया|


आसमान से धरा तक

फैले अमलतास के रंग को देख,

दिल में एक हूक उठी, 

जैसे कोई नयी उम्मीद जगा गया|


पीत वर्ण, अमलतास के पुष्प 

कुछ गुच्छों से टूटते और

धरा पर बिखर जाते,

कुछ वहीँ रह जाते रिश्ते निभाते|

.

उस कलाकार की बात निराली है|

पतझड़ में भी फूल 

खिला दिए अमलतास के|


तुम भी ना,

ख्यालों के ताने बाने में लिपटे

सुनहरे चमकते हुए 

उस अमलतास की तरह हो,

जिसको देखते ही मन खिल उठता है|


बसंती चादर ओढ़े 

जब बहार आती है,

पगडंडी पर खड़ा 

बरसों पुराना 

अमलतास का वृक्ष, 

सुगन्धित पुष्पों से

भर जाता है.

.

देख रही हूँ कई वर्षों से 

सुनहरी धूप  में लिपटे 

पीले  पीले अमलतास  के  पुष्पों  को. 

धीमी हवा के  झोंके  के  साथ 

मदमस्त, झूमते, इतराते हुए.

राहगीर भी बैठ जाते हैं 

कई बार राह में उन्हें निहारते हुए

.

हमारी बातें सुन

एक नयी उमंग के साथ 

खिलखिला कर हँस पड़ता है

अमलतास..

- पायल


Wednesday, June 10, 2020

यदि आप चाहें तो 

यदि आप चाहें तो हर हार को जीत में बदल सकते हैं. वक़्त को मुट्ठी में कर सकते हैं, थोड़ा नज़रिया बदल कर देखिये, ज़िन्दगी बदल सकते हैं सब कुछ हसीन लगने लगेगा, थोड़ी सोच बदल सकते हैं, पर... यदि आप चाहें तो.. . समझती हूँ, चाहतें हैं, थोड़ी मुश्किल से हासिल होती हैं, माना नज़रिया बदलना, सोच बदलना, आसान नहीं, पार कोशिश तो कर सकते हैं. उठ कर दो कदम तो चल सकते हैं. यदि आप चाहें तो.. बहती नदी सी है ये ज़िन्दगी, ठहरे रहने में क्या मज़ा, आगे तो बढ़ सकते हैं. कहते हैं न, जहाँ चाह, वहाँ राह.. पर... अगर आप चाहें तो! . मेरी बात मानें, तो ज़िन्दगी खूबसूरत है, इसे यूँ मत गँवाइये, उठिये, थोड़ा मुस्कुराइए, कुछ करना चाहते हैं, पर वक़्त नहीं है? अरे उठिये, वक़्त निकालिये, जो करना चाहते हैं कर डालिये! पर तभी कर पाएंगे अगर आप चाहें तो.. . बातों बातों में यूँ ही, क्यों उलझते हैं फ़लसफ़ों में, ज़िन्दगी को जी लीजिये न खुद को आज़माइये, यदि आप चाहें तो, मंज़िलें भी खूबसूरत हो सकती हैं, और रास्ते भी! पर.... लोगों की फ़िक्र छोड़, अपनी मदद कीजिये, थोड़ा हौसला रखिये, और हिम्मत भी, सब सही कर सकते हैं, अगर आप चाहें तो ~payal

Tuesday, June 2, 2020

राख को मत कुरेदिये

राख को मत कुरेदिये
 बेसब्र होकर
 कहीं अधजला हिस्सा
जी न उठे कोई याद बनकर

 गरम कोयले सी हैं
 दूर ही रहो इनसे
 कहीं जला न दे आपको
कोई याद खाक बनकर .

क्यों हवा देते हो
 बुझती हुई चिंगारियों को
 कहीं आग लगा न दे
 कोई टुकड़ा आस बनकर

 नज़दीकियों से तो
 दूरियां ही भली
 बस कहीं धुआँ न उठे
कोई आह बनकर .

जब आग लगी थी
 तब देखते
 अब वक़्त को बहने दीजिये
 फ़रियाद बनकर
~पायल

Saturday, May 9, 2020

एक और बात -1

एक और बात कहनी है तुमसे, बोलो तो कह दूँ|शब्दों को नहीं समझते, क्या चुप्पी को समझ पाओगे तुम? देर रात तक बस सोचती रहती हूँ |हम आगे बढ़ते जाते हैं ,लम्हे ढलते जाते हैं |सुख-दुःख , हंसी ख़ुशी , कितनी बातें, कितनी यादें, कितने सपने ,कितने वादे कितना कुछ वक़्त के आगे धुंधला पड़ जाता है..
जब दिल की परतें खुलती हैं, कई बार यादें घेरने लगती हैं..अक्सर कहते हो, यहीं हो तुम.. खुश हूँ मैं, पर क्या खुश हो तुम? बताओ क्यों हो गुमसुम? कुछ है जो कहना चाहते हो? पर कहने से घबराते हो? चलो छोड़ो, कह नहीं पाओगे ,और कहे बिना रह भी नहीं पाओगे|वक़्त पर छोड़ देते हैं, तुम खुद समझ जाओगे |ऐसी ही तो थी मैं| कहाँ बदला है कुछ?
बस यूँ ही डायरी के पन्नो के बीच में एक और किस्सा क़ैद हो गया |कब किसके हाथ लग जाए ये डायरी क्या पता| कितने किस्से हैं इस नादान डायरी में, कुछ हंसाते, कुछ रुलाते, कुछ बहुत कुछ सिखाते  और कुछ यूँ ही गुदगुदा जाते|कहानियां तो सब एक जैसी ही होती हैं बस उन्हें निभाते कैसे हैं एक बहुत बड़ा दायित्व होता है कहानीकार की लेखनी पर|जो मोड़ देना चाहे वो दे दे|
मैं सोचती हूँ अंत वो हो जिसमें किसी को दुःख न पहुंचे , जिसमें सबकी भलाई हो| कहते हैं न अंत भला, तो सब भला. #payalagarwal 

Friday, March 27, 2020

पुरानी यादें #3 

कुछ पुरानी तस्वीरें देखीं| सोफिया की याद आ गई| बाबाजी ने मम्मी से कहा था कि मुझे इंग्लिश मीडियम में ही पढ़ाएं| बर्मीज़ डांस किया था हमने| छतरी हाथ में लेकर| एनुअल फंक्शन था..कितने छोटे थे हम| नीले रंग की ड्रेस और बालों में मोटा वाला लाल रिबन. अजीब था पर अच्छा था! डिसिप्लिन तो स्कूल से ही सीखा. असेंबली में वन हैंड डिस्टेंस| सॉन्ग बुक के वो हिम्न्स आज भी याद हैं| टीचर्स स्ट्रिक्ट तो थीं पर प्यार भी करती थीं| केमिस्ट्री प्रैक्टिकल में जर्किन जल थी मेरी| केमिकल कुछ गलत मिला दिया था शायद| टीचर ने प्यार से समझा दिया| घर पर भी मम्मी को फ़िक्र तो हुई पर कुछ नहीं कहा| बस समझा दिया और फिर, कभी वो गलती नहीं दोहराई| जब गलती पता हो तो समझ में भी जल्दी आ जाता है| कितनी सारी खट्टी मीठी यादें हैं उन दिनों की| सिस्टर्स का मॉरल साइंस का लेक्चर ज़िन्दगी जीने का तरीका सिखाता था! ध्यान से सुनते तो ज़िन्दगी का सार था उनमें| कभी कभी स्कूल के बाद इकट्ठे होकर सहेलियों के घर चले जाते थे| बेफिक्री थी उन दिनों| वक़्त ही कुछ और था| सहेलियों का झुरमुट. शुरू से साथ में ही पढ़ रहे थे| कितनी बातें करते थे हम| गर्मियों की छुट्टियों में कॉमिक्स एक्सचेंज करने के बहाने सब इकठ्ठा होते थे| मिस स्टेला के मैचिंग इयररिंग्स और सैंडल्स कितना नोटिस करते थे| मूर्खाओं कह कर सम्बोधित करते हुए हमारी हिंदी की टीचर ने दो पंक्तियाँ बोली थीं उस दिन, अपनी लिखी हुई ,"चली जा रही थी, चली जा रही थी गाड़ी पटरी पर चली जा रही थी|" गहरी बातें होती थीं, पर समझता कौन था?.. तीज पर टीचर्स की मेहंदी कितनी अच्छी लगती थी| याद है एक बार एक टीचर ने बोला कि जब सालों बाद अपनी ग्रुप फोटोज देखोगे तब याद करोगे सब| हँस पड़ी थी हमारी पूरी क्लास| शादी, बच्चे कौन सोचता है तब| ग्रास ग्राउंड में हम फ़्री पीरियड में चले जाते थे| कभी धूप में क्लास होती थीं तो हम सब के चेहरे खिल जाते थे| ग्रास ग्राउंड के कोने में जंगली घास होती थी| हम उसकी छोटी सी टोकरी बनाते और उसको छोटे पीले और गुलाबी फूलों के गुच्छों से भर देते| क्लास में रो वाइज सिंगिंग कम्पटीशन करते और मार्क्स भी देते| छोटी छोटी चीज़ों में खुशियां ढूँढ लेते थे| हमारी सिंगिंग की टीचर कहती थीं कि मुझे गाना सीखना चाहिए| आर्ट टीचर आर्ट सिखाना चाहती थीं, ध्यान नहीं दिया कभी| उन सब्जेक्ट्स के बाहर ही नहीं निकल पाए जिनकी कभी कोई ज़रूरत ही नहीं पड़ी| अक्सर हम समझ ही नहीं पाते कि हम खुद क्या चाहते हैं| पहले पता होता तो कॉमर्स क्यों लेती? -पायल अगरवाल

Tuesday, March 24, 2020

पुरानी यादें #2 

कुछ दिन पहले ज़िक्र आया था उन दिनों का जब हर राष्ट्रीय पर्व पर पापा के सब चचेरे भाइयों के परिवार भी हमारे घर पर साथ बैठते थे| हंसी मज़ाक, किस्से कहानियों के बीच वक़्त का पता ही नहीं चलता था| कितना मज़ा आता था| सब कुछ ना कुछ बनाकर लाते थे| क्या कहते थे हम उसे? हाँ, पूल लंच| उस खाने का स्वाद ही अलग होता था| कितना प्यार घुला होता था उसमें| एक बार खूब बारिश हो रही थी| पंद्रह अगस्त थी शायद| लॉन में पानी भरने लगा था| मज़ा खराब हो जाता है ना? सब बड़े बारिश को रोकने के लिए अपना अपना टोटका बता रहे थे| फिर किसी ने बोला कि कैंची उल्टी गाढ़ दो बारिश रुक जाएगी| हम बच्चे क्यारी में कैंची गाढ़ रहे थे और सच में बारिश रुक गयी| हमारे लिए तो जैसे चमत्कार था| सब साथ होते थे तो त्यौहार होता था| और वो साल में दो बार जो माथुर फंक्शन होता था, याद है मुझे| वो घर पर एक महीने पहले से सबका इकठ्ठा होना| कितनी रिहर्सल करते थे| सरस्वती वंदना, नृत्य, नाटक, गीत और भी जाने क्या क्या| मम्मी कुछ न कुछ बनाती थीं नाश्ते के लिये| अच्छा लगता था| याद आ रही है वो फंक्शन के एक दिन पहले हमारे सत्युग आश्रम में ड्रेस रिहर्सल| फिर धीरे धीरे सब शहर से बाहर जाने लगे और वो फंक्शन भी साल में एक बार होने लगा| किसी की शादी हो गयी, किसी का ट्रांसफर| शहर भी सूना सा हो गया था| माँ के बिना आज ज़्यादा सूना लगता है| दिल से सब जुड़े रहें, इतना काफ़ी है| - पायल अगरवाल  

Sunday, March 22, 2020

पुरानी यादें #1

इमारत गिर रही थी..सब याद आ रहा था| पापा का तबला जीजी का डांस ताऊजी की सधी हुई कैलीग्राफी और मोती पिरोये हुए शब्द, जब लेखनी से लिखते थे तो देखते ही सब मंत्रमुग्ध हो जाते थे| ताईजी का गोल वरांडे में लगी कुर्सी पर बैठे घुटनों को सहलाना और वहीं से आवाज़ लगाना| और हाँ वो हाथ का पंखा तो जैसे उनसे छूटता ही नहीं था| मम्मी के हाथ के दहीबड़े....और उनकी मीठी सी डाँट सब याद आ रहा था| वो आम की बौर पर कोयलों का कूकना वो हमारा थाली में सुबह सुबह केवड़े के फूल इकट्ठे करना और फिर उनकी माला बनाना| जब आँधी चलती थी तब सब पहुँच जाते थे उस इमली के पेड़ के नीचे| साल भर के लिए इमली इकट्ठी कर लेते थे| गुड़िया की शादी भी तो करते थे पर विदाई नहीं करते थे| अपने गुड्डे गुड़ियों से लगाव जो था| अपनों सी बिछड़ने का दुःख तो बचपन से ही था| बातें होती थीं हमारे पास. वक़्त जो था..बस अच्छी यादों को समेटकर रखा है मैंने| होड़ लगी रहती थी हम बहनों में. कौन कितनी सुबह उठेगा| जब टहलने जाते थे शाम के वक़्त खुली सड़कों पर बिना किसी डर के शायद वैसा सा ही शांत वातावरण है आज... चिड़ियों की चहक आज ज़्यादा सुनाई दे रही है| पुरानी बातें पुरानी यादें आज कुछ ज़्यादा ही आ रही हैं| -payalagarwal

Saturday, March 21, 2020

अक्सर सोचती हूँ

अक्सर सोचती हूँ
 ये ख्याल कहाँ से आते हैं
दो पल ठहरकर
 फिर खो जाते हैं
 कभी कविताएं बन जाते हैं
कभी किस्से सुनाते हैं

 सच ही तो है
अतीत के पन्नों में
 जिस कविता को कभी हमने रचा
 आज वो कविता हमें रच रही है
 काँटों भरी राहों पर
 आस का दीप जला रही है
 रास्ता तय है
और मंज़िलें भी
 सौभाग्यशाली हूँ
मेरी कविताओं ने मुझे चुना
 वरना शब्द तो यूँ भी बिखरे थे
फ़िज़ा में खुशबू की तरह..
 बिखरे हुए मोती जैसे
 सिमट गए कुछ लफ़्ज़ों में..
नज़्मों की तरह ~पायल