Monday, August 27, 2012

वो पल..

वो पल भी अजीब थे
वक़्त थम गया था
ओस से भीगी पत्तियों पर
कोई नगमे लिख गया था 

नवजीवन का प्रकाश 
धीमे स्वर का आभास 

कुछ न होने से
कुछ होना अच्छा
सुखद एहसास दिलाती
कुछ यादें ही सही
~~पायल~~

Wednesday, September 29, 2010

...

हमने बहुत कहा किसी से एक ज़माने में
इतना प्यार न करो,भलाई है भूल जाने में
डूबे हुए आज हम हैं उनके ख़यालों में
और वो मशगूल हैं हमें आज़माने में
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अगर सवाल न हों तो जवाब की किसको तलाश होगी
ज़िन्दगी यूँ ही खुद से बेख़बर अनजान बसर होगी
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~~पायल~~

Monday, July 26, 2010

सावन

तपते रेगिस्तान में
जब कोई छेड़ता मेघ मल्हार
बदरी छाती नयनों में
बरसता सावन ज़ार ज़ार
कोपलें फूटतीं
धरती झूम उठती
जब आस बंधाते उड़ते बादल
उड़ेलते अपना प्यार
~~पायल~~

Friday, December 11, 2009

खट्टी मीठी ज़िन्दगी के भूले बिसरे पल...

खट्टी मीठी ज़िन्दगी के भूले बिसरे पल
यादों के झरोखे से आज झांकते हैं
:
:
सीने में दबे हुए अनगिनत जज़्बात
वक्त के साथ धुंधले नज़र आते हैं
:
:
ओस में भीगे सीले हुए पत्ते
मोती बन आज आंखों में टिमटिमाते हैं
:
:
सागर में निरंतर उठते ज्वार भाटे
अक्सर साहिल पर आकर शांत हो जाते हैं
~~पायल~~

Thursday, November 26, 2009

सुर संग तान मधुर घुले जब..

सुर संग तान मधुर घुले जब
प्रीत अधूरी गीत बन जाये…
धुआं उठे जब आहों से तब
हिमनदी भी पिघली जाए

धरती संग गगन झूमे जब
सागर यूँ हिचकोले खाए
सीने में उठे तूफ़ान तब
जीवन नय्या डूबी जाए

सांझ ढले दिया जले जब
रंज-ओ-ग़म दूर हो जाए
पलकों पर मोती सजे तब
सतरंगी फ़िज़ा में घुल जाए

यादों के गलियारे में जब
तारों की महफ़िल सज जाये
चाहत के मेले लगे तब
दूर कहीं मेघ नीर बरसाए

~~पायल~~

Monday, November 2, 2009

उलझन....

ना जाने क्यूँ यह ख्याल आया
और अंतस में घर कर गया
दूर पड़ा एक कागज़ का टुकड़ा
कुछ सुनी हुई कहानियाँ सुना रहा था
अपने हाथ में उठा कर
अपनी हथेली से दबाकर
उसकी सिलवटों को हटाया
और गौर से देखा
तो परछाइयों में क़ैद
छटपटाता हुआ एक साया नज़र आया
जो अनायास ही चीखने चिल्लाने लगा

वो देखना चाहता था
अपनी आँखे मूँद
महसूस करना चाहता था
रुकी हुई धड़कन को
उड़ना चाहता था
पंछियों के संग
गाना चाहता था
कुछ अनसुने गीत
पहचानना चाहता था
ख़ुद को..

पर बदली हुई गति
से आख़िर बदल ही गया वो साया
अंधेरों में भी
महसूस कराता था जो अपना वजूद
आज सिलवटों में लिपटा हुआ
अधूरा सा दिखता है अब
पड़ा हुआ है कहीं दूर
अंधेरों में ढूंढता है अब अपना वजूद..
ना जाने क्यूँ यह ख्याल आया
और अंतस में घर कर गया !
~~पायल~~

Thursday, October 1, 2009

जाने कहाँ....

विचलित मन
एक घूमता हुआ आइना सा
भटकता हुआ
अठखेलियाँ करता,
अधीर,असहाय सा
अक्स दिखता उसमे निराकार
कभी कुछ मेरे जैसा
कभी दिखता वो बिल्कुल तुमसा

पगला सा मन
न कोई विकल्प है
न कोई समाधान
फिर भी निकल पड़ता है
बदहवास सा किसी खोज में
दूर जाने क्या तलाशता हुआ
जैसे मैं निकल पड़ी हूँ
जाने कहाँ यूँ ही लिखते लिखते..
~~पायल~

Sunday, September 27, 2009

एक ख़बर


सुनी थी एक रोज़ एक ख़बर
दहशत फैलाती मीलों तक
एक आदमखोर बाघ की
जो अचानक गरीब के खेतों में आता
और बच्चों को उठा कर ले जाता
उन्हें चीरता फाड़ता और यूँ ही बदहवास छोड़ जाता
आज फिर वही ख़बर सुनी
कुछ उड़ती उड़ती पर कुछ बदली हुई सी
शायद ज़माना बदल गया है
आज वो आदमखोर बाघ नहीं था
एक बाघ की खाल ओढे आदमी था
क्या पता सच है या झूठ
पर छोटे कस्बों में ये शोर आम है
कहते हैं सब "जो बीत गई सो बात गई"
पर मेरे ज़हन में एक सोच छोड़ गई
क्या तब बुझेगी इसकी प्यास
जब इसके अपने बच्चे होंगे आस पास ??
~~पायल~~