Friday, June 17, 2016

 लहरें

ढलती हुई शाम को देख 
समुद्र की लहरें और बेचैन हो उठीं 
दूर क्षितिज पर धीरे-धीरे 
अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जहाज में 
जैसे हजारों तारे टिमटिमा रहे थे 
डूबते सूरज को देखते हुए 
मैं काफी देर तक सोचती रही
शायद मैं भी उस लहर की तरह थी 
जो साहिल से टकराकर 
फिर लहर बन जाती थी 
-पायल 

Thursday, November 6, 2014

कैसे याद करूँ..


क्या याद करूँ
उन बीते हुए पलों को,
 आज बहुत से ख्याल उमड़े
 इस भीगे से मन में ,
हँसते , खिलखिलाते ,
अठखेलियां करते ,
कभी गुदगुदाते ,कभी रुलाते,
हौले से सहलाते ,
सपने दिखाते ,
ठंडी हवा छूकर
अपने होने का एहसास
 कराती हुई चली गयी। 
 एक ख्याल तनहा कर गया।
सूरज की किरणें
मानो आज उदास हैं,
कुछ कहना चाहती हैं
पर सकुचाती हैं।
हलकी सी धुंध है,
कोहरा घिरने लगा है।
कैसे याद करूँ
उन बीते हुए पलों को,
जो भीगे हुए पन्नो में
राख बन चुके हैं। 
~~ पायल ~~ 
 
 
 

Thursday, March 27, 2014

कैसी हूँ मैं?

हल्की सी हंसी में सिमटा हुआ थोड़ा सा ग़म
कुछ पुरानी कहानियों में
कुछ बीते हुए पन्नों में
कुछ ऐसी यादों में
जो याद भी नहीं आती.

कुछ भूल गयी हूँ शायद
खुद को?
या शायद तुमको?
या उन लम्हों को
जो कभी ज़िन्दगी लगते थे
थक गयी हूँ अब
कहानियाँ बुनते बुनते

रुक गयी हूँ कहीं शायद
या फिर
खो गयी हूँ कहीं
बता दो
कैसी हूँ मैं?

आज जाने क्यूँ
ढूंढती हूँ खुद को
कुछ उलझे से सवाल हैं,
कुछ सीधे से जवाब
जो सिर्फ तुम्हारे पास हैं
~~पायल~~
 

Sunday, August 11, 2013

ज़िन्दगी

दो पल रूककर चल पड़ती है ज़िन्दगी
सांस सांस हवा सी बहती है ज़िन्दगी

यादों में कुछ इस तरह ढ़लती है ज़िन्दगी
आँखें मूंदे फिर कभी नज़र आती  है ज़िन्दगी

कभी अठखेलियाँ करती है कभी मुस्कुराती है ज़िन्दगी
कभी थकी हुई गुमसुम नज़र आती है ज़िन्दगी

कभी खुद को खुद से चुराती है ज़िन्दगी
कभी खुद को खुद से मिलाती है ज़िन्दगी

कभी ठहरोगे कहीं दो पल के लिए राही
फिर देखना ज़रा कितना सताती है ज़िन्दगी

किसी के लिए कभी जी कर तो  देखो
चुपके से तुम्हें उसकी जान बनाती  है ज़िन्दगी

भीगी दोपहर में मचलती आँगन में धूप सी
छुपती-छुपाती खामोश क़दमों से आती है ज़िन्दगी

ख्वाब सजाती ,हंसाती-रुलाती,भागती-दौड़ती ये  ज़िन्दगी
आती जाती साँसों के बीच डूबती उभरती ज़िन्दगी
~~पायल ~~

Wednesday, May 29, 2013

बारिश

 बारिश..
 कितना कुछ सिमटा हुआ है
 इस एक शब्द में...
मौसम का बदलाव ,
मिट्टी की सौंधी खुशबू..
लहलहाती फ़सलें और हरियाली..
भड़ास निकालते गरजते बादल...
कौंधती बिजली
कौन जाने कितना कुछ 
समेटे हैं अपने भीतर
सिहर जाती हूँ मैं ये सोचकर..

मौसम की पहली बारिश में भीगते ही 
न जाने कितनी उम्मीदें ,कितने सपने,
कितनी यादें और कितने एहसास
डबडबाई आँखों में 
पल भर में झिलमिलाने लगते हैं ..
सब कुछ अपने भीतर 
समेटे आती है ये बारिश..
बरसती है,भिगाती है,
घर का आँगन
भीतर ही भीतर कुछ कहता है मन
न जाने कितनी यादें ..

और बस !
 बरसने लगती है बारिश ..
रिमझिम ..
सकुचाती, सहमी हुई  बारिश ..
सूनी सड़कों पर 
बारिश से बचते लोग
क्या कभी समझ पाएंगे
क्या कहती है ये बारिश!?
~~ पायल ~~ 

Wednesday, March 13, 2013

सुनो,कहा था ना मैंने?

सुनो,
ऐसे ही थोड़ी कहती थी मैं 
कि तुम नहीं समझोगे!

कितने ख़याल थे
छुपे  हुए किसी कोने में,
कुछ अधखिले,
कुछ मुरझाये,
जज़्बातों  की तरह।

आज बरसों बाद, 
उन्ही ख्यालों को समेटते हुए, 
उलझे हुए  
इस कहानी के धागे में,
 शब्दों को पिरोने
की नाकाम कोशिश
करती  हूँ।

एक मुस्कुराती हुई नज़्म 
का इंतज़ार है।
उदासी की लकीरों के पीछे
से झांकती नम आँखें
अचानक झंझोर कर
जगा जाती हैं ।
आजकल कुछ बदल गया है,
 मैं ऐसी ही तो थी!

सुनो,
कहा था ना मैंने?
कुछ दबी सी आवाज़ में?
बस इतना ही याद है मुझे!
~~ पायल ~~ 

Monday, August 27, 2012

वो पल..

वो पल भी अजीब थे
वक़्त थम गया था
ओस से भीगी पत्तियों पर
कोई नगमे लिख गया था 

नवजीवन का प्रकाश 
धीमे स्वर का आभास 

कुछ न होने से
कुछ होना अच्छा
सुखद एहसास दिलाती
कुछ यादें ही सही
~~पायल~~

Wednesday, September 29, 2010

...

हमने बहुत कहा किसी से एक ज़माने में
इतना प्यार न करो,भलाई है भूल जाने में
डूबे हुए आज हम हैं उनके ख़यालों में
और वो मशगूल हैं हमें आज़माने में
-----------------------------------
अगर सवाल न हों तो जवाब की किसको तलाश होगी
ज़िन्दगी यूँ ही खुद से बेख़बर अनजान बसर होगी
------------------------------------
~~पायल~~