Thursday, February 28, 2019

ये शहर

ये जागते हुए शहर, ये जगाते हुए शहर।
दूर से कुछ खास नज़र आते ये शहर।

इस भीड़ में कहीं खो से जाते।
शोरगुल में खुद से दूर जाते ये शहर।

ऊब जाते वीराने में डूबकर।
सुकून की नींद तलाशते ये शहर।


यादों की बस्तियों में घरोंदे बसाते।
जागते शामो-सहर, किस्से सुनाते ये शहर।

कुछ उजाड़ से अस्तित्व की तलाश में।
हम सबके बीच बँटते जाते ये शहर।


बेमिसाल गहराई है कुछ ख्यालों में।
खुद की आवाज़ ना सुन पाते ये शहर।


किस शहर से चले आते हो?
किस शहर में बसना चाहते हो?
वोजो सरहदें बनाता है
या वो जो सरहदें मिटाता है?
एक शहर भीतर जलता है।
एक शहर दिलों में पलता है।
-पायल

Saturday, June 23, 2018

बेचैन , बरसाती लहर में ,
गुमसुम सी मुस्कराहट 
करवट बदलती 
बिस्तर पर पड़ी थी 
प्यार से सींचा 
तो नयी पत्ती सी कोमल 
ताज़गी बन चहक उठी 
घर भर में फिर से 
मुस्कुराने लगा जीवन 
फिर से महक उठा कण कण 
- पायल
23.6.2018

 

Thursday, May 10, 2018

एक तूफ़ानी रात

बदला हुआ मिज़ाज था मौसम का
सुबह तक बरसा था पानी
गिरे हुए पेड़, और बिछे हुए पत्ते,
गवाह हैं, उस तूफ़ान के,
जो आया और गुज़र गया।

चमकती धूप को देख,
कौन कह सकता है,
कल रात तूफ़ान आया था
कौंधती बिजली, और  तीखी तेज़ बारिश
साथ लाया था।

किसी का मकान कच्चा है
किसी  की बेटी की शादी
और  भी न जाने क्या क्या
कितने ख़्याल आये थे उस पल
कितनी चिंताऐ घेरने लगी थी यूँ ही।

दो पल की ये चिंताऐ
और दो पल का तूफ़ान...

सब गुज़र  जाता है
वक्त बदल जाता है
और कुछ आदतें भी!
-पायल 

Sunday, July 16, 2017

ये पल..

सावन का पहला सोमवार
मिट्टी की सौंधी खुशबू
और बारिश में भीगता मन
एक छतरी
फूलों के रंग
भीगते हम
आधी मैं और
आधे तुम
-पायल
10.7.17

मेरी कलम से..

चलो, आज फिर दिल टटोलते हैं
बेधड़क कुछ राज़ खोलते हैं

एक गहरी साँस में न जाने
कितने मचलते गुमसुम लम्हे
 मुट्ठी में दबे चंद अल्फ़ाज़
मेरी कलम की स्याही से बोलते हैं
चलो, आज बंद मुट्ठी खोलते हैं

क्या छूट गया,  क्या साथ लाये,
क्यों सोचना? क्या अगला,
क्या पिछला, बस आज है,
आज ही चलो बोलते हैं
चलो, आज में रंग घोलते हैं

चलो, आज फिर दिल टटोलते हैं
बेधड़क कुछ राज़ खोलते हैं
-पायल
10.7.17

Monday, June 12, 2017

कुछ लम्हे मेरे अपने

ज़िन्दगी से कुछ लम्हे
खुद के लिये चुरा लेती हूँ
यही वो पल हैं
जब खुद को गले लगा लेती हूँ

न कोई शिकवा है
न कोई शिकायत है
बस यूँ ही हर पल सीखते सिखाते
ज़िन्दगी आगे बढ़ा लेती हूँ

कुछ करने की चाह में
थोड़ा हौंसला बंधा लेती हूँ
बन्दिशें नहीं हैं इसीलिये
बंधनों में बंधकर भी
रिश्ते निभा लेती हूँ
-पायल 6/4/2017

Thursday, August 25, 2016

एक सावन ऐसा भी


जब दिल से कोई बात निकलती थी
और बादल बन बरस जाती थी
कभी कभी, मैं बहुत डर जाती थी

अजीब सा सन्नाटा था
अजीब सा शोर
उसके बीच में
कुछ अपनों के साथ
खुद को संभालती मैं

और फिर.. सिर्फ शून्य

जन्म , मृत्यु , मोक्ष
सब कुछ यहीं तो है
क्यों भटकते हैं लोग
ना जाने क्या चाहते हैं

इंद्रधनुष ही तो माँगा था ना तुमने मुझसे?
~~ पायल ~~

 

Monday, August 1, 2016

सुकून



आज काफ़ी दिनों के बाद 
घर से बाहर निकली 
दुनिया कुछ बदली बदली लगी 
तूफ़ान ,
तबाही
फिर शांति
यही प्रकृति का नियम है
यूँ ही देना मेरा साथ
इस साथ में सुकून है
~~पायल~~