Sunday, July 16, 2017

मेरी कलम से..

चलो, आज फिर दिल टटोलते हैं
बेधड़क कुछ राज़ खोलते हैं

एक गहरी साँस में न जाने
कितने मचलते गुमसुम लम्हे
 मुट्ठी में दबे चंद अल्फ़ाज़
मेरी कलम की स्याही से बोलते हैं
चलो, आज बंद मुट्ठी खोलते हैं

क्या छूट गया,  क्या साथ लाये,
क्यों सोचना? क्या अगला,
क्या पिछला, बस आज है,
आज ही चलो बोलते हैं
चलो, आज में रंग घोलते हैं

चलो, आज फिर दिल टटोलते हैं
बेधड़क कुछ राज़ खोलते हैं
-पायल
10.7.17

Monday, June 12, 2017

कुछ लम्हे मेरे अपने

ज़िन्दगी से कुछ लम्हे
खुद के लिये चुरा लेती हूँ
यही वो पल हैं
जब खुद को गले लगा लेती हूँ

न कोई शिकवा है
न कोई शिकायत है
बस यूँ ही हर पल सीखते सिखाते
ज़िन्दगी आगे बढ़ा लेती हूँ

कुछ करने की चाह में
थोड़ा हौंसला बंधा लेती हूँ
बन्दिशें नहीं हैं इसीलिये
बंधनों में बंधकर भी
रिश्ते निभा लेती हूँ
-पायल 6/4/2017

Thursday, August 25, 2016

एक सावन ऐसा भी


जब दिल से कोई बात निकलती थी
और बादल बन बरस जाती थी
कभी कभी, मैं बहुत डर जाती थी

अजीब सा सन्नाटा था
अजीब सा शोर
उसके बीच में
कुछ अपनों के साथ
खुद को संभालती मैं

और फिर.. सिर्फ शून्य

जन्म , मृत्यु , मोक्ष
सब कुछ यहीं तो है
क्यों भटकते हैं लोग
ना जाने क्या चाहते हैं

इंद्रधनुष ही तो माँगा था ना तुमने मुझसे?
~~ पायल ~~

 

Monday, August 1, 2016

सुकून



आज काफ़ी दिनों के बाद 
घर से बाहर निकली 
दुनिया कुछ बदली बदली लगी 
तूफ़ान ,
तबाही
फिर शांति
यही प्रकृति का नियम है
यूँ ही देना मेरा साथ
इस साथ में सुकून है
~~पायल~~

 

Tuesday, July 26, 2016

उम्मीद


ना जाने कितनी बार ,
खुद को मारा 
और फिर ज़िंदा किया। 

बस एक उम्मीद  के सहारे
जो जागती तो है  
दिल के किसी कोने में 
पर फिर चुपचाप 
आँखें मूँद सो जाती है 
बस 
मुझे ज़िंदा 
रखती है  
उम्मीद। 
~~पायल ~~

Friday, June 17, 2016

 लहरें

ढलती हुई शाम को देख 
समुद्र की लहरें और बेचैन हो उठीं 
दूर क्षितिज पर धीरे-धीरे 
अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जहाज में 
जैसे हजारों तारे टिमटिमा रहे थे 
डूबते सूरज को देखते हुए 
मैं काफी देर तक सोचती रही
शायद मैं भी उस लहर की तरह थी 
जो साहिल से टकराकर 
फिर लहर बन जाती थी 
-पायल 

Thursday, November 6, 2014

कैसे याद करूँ..


क्या याद करूँ
उन बीते हुए पलों को,
 आज बहुत से ख्याल उमड़े
 इस भीगे से मन में ,
हँसते , खिलखिलाते ,
अठखेलियां करते ,
कभी गुदगुदाते ,कभी रुलाते,
हौले से सहलाते ,
सपने दिखाते ,
ठंडी हवा छूकर
अपने होने का एहसास
 कराती हुई चली गयी। 
 एक ख्याल तनहा कर गया।
सूरज की किरणें
मानो आज उदास हैं,
कुछ कहना चाहती हैं
पर सकुचाती हैं।
हलकी सी धुंध है,
कोहरा घिरने लगा है।
कैसे याद करूँ
उन बीते हुए पलों को,
जो भीगे हुए पन्नो में
राख बन चुके हैं। 
~~ पायल ~~ 
 
 
 

Thursday, March 27, 2014

कैसी हूँ मैं?

हल्की सी हंसी में सिमटा हुआ थोड़ा सा ग़म
कुछ पुरानी कहानियों में
कुछ बीते हुए पन्नों में
कुछ ऐसी यादों में
जो याद भी नहीं आती.

कुछ भूल गयी हूँ शायद
खुद को?
या शायद तुमको?
या उन लम्हों को
जो कभी ज़िन्दगी लगते थे
थक गयी हूँ अब
कहानियाँ बुनते बुनते

रुक गयी हूँ कहीं शायद
या फिर
खो गयी हूँ कहीं
बता दो
कैसी हूँ मैं?

आज जाने क्यूँ
ढूंढती हूँ खुद को
कुछ उलझे से सवाल हैं,
कुछ सीधे से जवाब
जो सिर्फ तुम्हारे पास हैं
~~पायल~~